Sunday, 8 September 2013

“अब सूरज निकालना चाहिए”

है अंधेरा तो बहुत,
अब सूरज निकलना चाहिए ।
मन के शिथिलता को काट,
एक ऊर्जा निकलनी चाहिए ।
सहते रहोगे कबतक,
उस हर अत्याचार को।
जिसके विरुद्ध हम सबकी,
एकजूट आवाज निकलनी चाहिए।
हर ओर घनघोर अंधेरा है,
फैल रहा भ्रस्टाचार का घेरा है।
हो रहा नारी का शोषण है,
नवजात का हो रहा न पोषण है।
जिसे चुना वही लूट रहे,
फिर भी हम सब मूक देख रहे।
हिंसा न हो, ईर्ष्या न हो,
ये है सबकी प्रार्थना।
पर हे ईश्वर करो कृपा,
न छिन जाए सबकी चेतना।
मूक होकर सब बस खड़े रहे,
इस देश को लुटता देख रहे।
जो लगे अपने घर मे आग,
वो हाहाकार मचाते है।
जो हो दूजे का तो फिर वो,
पहले अपनी जान बचते है।
समय नहीं वो दूर बहुत,
जब सब्र के बांध भी टूटेंगे।
संकट जब घर आएगा,
तो अपने- आप से रूठेंगे।
धैर्य सही पर इतना नहीं,
की लुट जाए मानवता का नाम।
और हम सब मूक बने,
कर रहे हो कहीं विश्राम।

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